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जाहि दिन हम मरब (कविता)

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राजन दास प्रकाशित शनिबार, जेठ १९, २०८१

हमर समाज बाजार मे रहत
ओ घनिष्ठ मित्र लोकनि स्तब्ध भ’ जेताह
हमर परिवार नष्ट भ’ जायत
जाहि दिन हम मरब

हमर टांग आराम करत
आँखि देखब छोड़ि देत
कान सुनब छोड़ि देत
मुँहसँ सम्बोधन
जाहि दिन हम मरब

कियो हरियर बाँस काटि लेत।
कियो छूरी कीनय जा रहल अछि
ओहि आगि मे कतेको लोक जमा हेताह
जाहि दिन हम मरब

देह मे साँस नहि अछि
तहियासँ हम छी
मुँह मे कोनो वाक्य नहि अछि
चारि गोटे लऽ कऽ चलत
हमर देहकेँ आगिसँ जरा देत
जाहि दिन हम मरब

समाज गीत गाबय लागत
सतरु मित्रक व्यवहार देखाओत
पिता नोर नहि देखाओत
माँक आँखि मे अविराम नोर बहत
जाहि दिन हम मरब

हमर समाज आइ चौंक गेल अछि
हमर संगी सभ चौंक गेल अछि
ई माहौल चौंकाबय वाला अछि
आ हम चौंक गेल छी
जाहि दिन हम मरब

ओ कारी कुकुर हमरा खोजय जा रहल अछि
ओ चिड़ै पूछत
ओ धागा हमर प्रतीक्षा मे रहत
जे बदला मे हमर दिस देखत
जाहि दिन हम मरब

सब कियो हमर पिताजी स पूछत
सैकड़ो प्रश्न उठत
एकर जवाब मात्र एकटा अछि
चौंक गेल चौंक गेल चौंक गेल
जाहि दिन हम मरि गेलहुँ।

( लेखन दास सहिदनगर नगरपालिका-८ बिसरभोराका हुन् ।)

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